ज़रुरत

जरुरते हर इंसान होती हैं। लेकिन पुरी तो किसी की होती हैं। लेकिन जिस की पुरी नहीं होती वो भी पुरी जतु झहन करता हैं उन्हे पुरा करने की नही तो वो अपना जीवन कैसे जीएगा इसलिए हर किसी को अपनी जरुरतो के जरीये ही सही जीवन से लड़ना और हर वक्त अपने नसीब़ को हराना नहीं छोड़ना चाहिए.

जरुरतों को पूरा करने के लिए ही तो इंसान अपने घर को छोड़ कर के जाता है किसी के घर के बाहर पहरा,गाड़ी चलाने जैसे काम करता वरना तो किसी को कया पडी़ हैं किसी के पास जाकर काम करने की सब अपने अपने ही घर में ना रहते. इसलिए ना तो पूरी जिंदगी जरुरते पूरी होती हैं। और ना इंसान काम करना छोड़ता हैं.

Writer manisha drall.

बटवारा

बटवारा तो आज के वक्त मे तो दिलो का चीड़ फाड़ जैसे डॉक्टर करते हैं ना ओप्रेशन टेटर वैसे आज के दोर में दिल के जसबातो के साथ होता रहा हैं।

बटवारा पहले सिफ्र ज़मीन जायददात़ का होता था आज के दोर में तो दिल के ज्जबातो का होता हैं। जहां इन जशबात की कोई कदर नहीं होती जहां भावनाओ का कोई मोल ही नहीं हैं इन बातो को तो वयर्थ की बात कहकर उस इंसान को पिछे दकेल देते हैं। और आज के बटवारा कलयुग का प्रमाण है. जिस के आधार पर कलयुग कि चरम सीमा नापी जा सकती है। कि कलयुग किस सीमा तक पहुच गया हैं.

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सलाहकार

हर किसी कि जिंदगी में एक सलाहकार जरूर होना चाहिए या फिर होता तो हैं हि हम इन दोनो बातो मे से एक तो जरुर एक भी बात बन जाए तो जीवन की आधी मुसिबतो का वैसे ही समाधान निकाल आता हैं।

जीवन हर मोड़ पर या फिर यु कहु कि जीवन मे आधी से अधिक मुसिबतो का तो समाधान एक अच्छा सलाहकार हि निकल सकता हैं। और हर किसी के जीवन बुरी बातो मे साथ देने वाले तो आपको बहुत ज्यादा मिल जाएगे लेकिन जो मुसिबत की जड़ को जान जाएगा उस से अच्छी सलाह तो सायद ही कोई दे पायेगा.नसिहत देने वाले तो बहुत होते हैं। लेकिन सच्चा दोस्त तो वो ही कहलाएगा जो मुसिबत मे भी प्यार से काम की बात हमारे तरीके से हमारे कान मे डाल जाएगा. ऐ अब हम पर निर्भर हैं। कि हम उस इंसान और उसकी सलाह को समझ पायेगे या नहीं.

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तजुरबा़

ये जीवन में जीतनें भी हम सब दुखो को झेलकर अपना जीवन और जीतना सयम से काम लेते हैं और जीतना कठिनाइयो से लड़ कर फिर डट कर खड़े रहते तब उसके बाद जो वो पल निकल जाता हैं। उसके बाद हम जो खुशी महसुस होती हैं। उसे तजुरबा़ कहते हैं और हम इस बात को किसी के साथ जब हम साजा करते और हमारी बात अगर किसी के काम आती हैं तो उसे हम अपने उस वक्त कि कमजोरी होने के बाउजुद हम अपनी अंदर कि मजबुती का अहसास करवाते है

और इसी प्रकार हमे आज भी अपने माता और पिता, दादा,दादी आदि कि बातो के तजुरबे हमे आजीवन काम आते रहते हैं और इसलिए हमे अपने बडे़ बुर्जुग को हमेशा अपने पास और उनका सम्मान करना चाहिए और ना ही कभी भी उनका र्निआदर करना चाहिए कयोंकि उनका तजुरबा़ हमारे बहुत काम आता हैं।

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इंतजार

इस जीवन में हर चीज़ के लिए इंतजार करना पड़ता हैं और वो हर काम के लिए करना पड़े तो इतना बुरा तो भगवान किसी के साथ ना करे कयोंकि हर बार और हर छोटी खुशी के लिए इंतजार नहीं किया जाता और कितने वक्त तक इंतजार करना ये कोई वक्त थोडी ना पता हैं इसलिए हर वक्त इंतजार करके भी इंसान अंदर ही अंदर टुट जाता भले ही वो बहार अपने आप को कितना भी मजबुत कयो न दिखाएं लेकिन एक बार तो उसकी भी हिम्मत जवाब़ दे जाती हैं।

भले ये कहा गया कि इंतजार का फल अत्य अधिक मीठा होता हैं। लेकिन कई बार तो उस मीठे फल को चखने तक की भी हिम्मत शरीर में नहीं बचती. और इंसान मायुस बैठ जाता हैं। उस मीठे फल के आने के बाद भी आज के दोर में किसी चीज़ को हासिल करना तो इंसान के पास बस एक ही चीज़ वो है इंतजार.

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शब्द

शब्द एक अच्छा होता हैं। और दुसरा बुरा दोनो ही सुरतो मे शब्दो का असर हमारे जीवन पर जरुर पड़ता हैं कयोंकि हम जब अपने बारे मे अच्छा सुनते हैं तो हम भले ही अच्छा महसूस करे लेकिन इस से हमे अपने उपर घमण होने लगता हैं और जैसे ही हम अपने बारे मे बुरा सुनते हैं तो हमारा आत्मविश्वास गिरने लगता हैं

और कुछ शब्द तो किसी भी इंसान को झाड पर चढा़ कर काम करवाने के लिए भी इस्तेमाल किये जाते हैं। तो कुछ शब्द किसी भी इंसान को निचा दिखाने में इस्तेमाल किया जाता हैं। जिन हम ताना देना कहते है कुछ लोग इतनी उचाईयो को छु कर भी जमीन से जुडे रहते हैं और जरा भी घमण नही होता उनकी बातो मे और इतने सरल शब्दों में बाते करते हैं लगता ही नही हैं। कि वो इतना सरल इंसान कैसे है. इसलिए ही तो कहा कि तलवार का घाव भर जाता हैं। लेकिन शब्दों को घाव तो मरने के बाद भी ताजा़ रहता हैं.

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पकवान

पकवान शब्द तो आज कल बस शब्द बन कर रह गया हैं। कयोंकि आज कल तो किसी से ना तो ज्यादा मीठा और ना ही किसी से ज्यादा नमक या घी का खाना खाया जाता हैं। और पहले तो छोटी छोटी छोटी बातो मे शरत त कहो या होड़ लगती थी और फिर एक किलो आधा किलो घी या हलवा बातो बातो मे खा जाते थे

आज कल के बच्चे सुबह एक पीस मिठाई का खाकर रात तक मीठा नही खाते और सुबह थोडा़ सा ज्यादा नमकीन खाना खा लेते हैं तो शाम होते ही कहने लगते हैं सुबह इतना नमकीन खाना खाया था कि अब तो मै बस दुध पी कर ही सोने वाला हु.और तो और आज कल के इस पीजा बर्गर ने तो बच्चों का रोटी सब्जी खाना तो बिल्कुल ही कम करवा रखा है जिस की वजह से उनसे एक रोटी पुरे दिन मे खाई जाती हैं। और पीजा दो तीन खा लेते हैं तब भी और मगवा दो खतम नहीं होता इनका कहना.

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परवरिश

परवरिश अच्छी हो या बुरी दोनो ही सुरतो मे बच्चों को जीवन जीना सिखाना होता हैं। कुछ लोग बुरी शिक्षा देकर अपने बच्चों को चोर चक्का बनाते हैं और कुछ लोग उच्च शिक्षा देकर सम्मानित जिदकीं जिना सिखाते हैं लेकिन आज के दोर में हम चाहे अच्छी या बुरी दोनो मे से कुछ भी शिखा रहे हो वो बच्चा नही शिखता वो तो अपने मन मुताबिक ही चलते है आज कल बच्चे बहुत अधिक आगे की सोचते हैं इसलिए वो अपने मन के मुताबिक चलते है

और वैसे भी किसी को कितनी भी शिक्षा दे वो करता तो अपने मन की ही करता हैं जिसकी वजह से आज कल किसी की भी परवरिश पर हम उगंली नहीं उठा सकते हैं। कयोंकि हमे अभी तो हम अपनी औलाद का भी भरोसा नहीं कर सकते हैं। कयोंकि वो भी बड़ा होकर अपने मन के मुताबिक ही चलेगा फिर हमे भी उसका कहा मानना पड़ेगा.

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दशहरा

दशहरा उत्सव बहुत धुम धाम से मनाने का पर्व हैं और ये कयो मनाया जाता हैं। इसके बारे में सब जानते हैं लेकिन आज कल के बच्चों को बस जब तक त्यौहार होता हैं। तब तक ही याद रहता हैं पहले हमारे वक्त पर तो हम सब को कभी कुछ भी पुछने पर हम फ़टाक से बोल देते थे ऐ त्यौहार कब कैसे मनाते हैं लेकिन आज कल के बच्चे तो कुछ दिन बाद ही भुल जाते हैं। और हर साल मनाने कू वक्त ही पिछले साल का याद आता हैं।

रावण के दशं मुख के सामान ही लगा तार दशं दिन तक राम लिला मनाई जाती हैं। और दशं में दिन ही रावण दहन किया जाता हैं। रावण को इस दुनिया से मुक्ति दिलाई जाती हैं। करोना से पहले तो बच्चों के लिए मेले भी लगाते थे अब दो साल से तो सब कुछ बंद हो गया हैं। लेकिन लगता हैं अगले साल तो फिर से सब त्यौहार पहले जैसे ही मनाये जाए.

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बीरबल और अकबर

बीरबल और अकबर इन दोनों की कहानियॉं हम सब ने बहुत सुनी और पढी़ हैं लेकिन हम ने ये गोर किया है कभी भी की बीरबल और अकबर की इतनी कैसे बनती हैं आईये थोडा़ इस पर आज विचार किया जाए

बीरबल कि सूझबुझ के आगे अकबर भी नर मस्तक हो जाते इसलिए अकबर बीरबल को अत्य अधिक सम्मान और इज़्ज़त करते थे जिस की वजह से दरबार के बाकी सदस्य चिड़ते और खुनस मे भरे बैठे रहते थे

लेकिन बीरबल के पास उन सबको भी सबक सिखाने के सारे उपाय मोजूद रहते थे और अकबर भी बीरबल से विचार विर्मश किए बगर कोई भी फैसला नहीं करते थे और बीरबल भी पुरे राज्य के हित में हुए कार्य की सलाह देकर पूरे राज्य का बहखुबी खयाल रखते थे

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